हरेला पर्व उत्तराखण्ड की सांस्कृतिक परम्परा

Share

हरेला पर्व उत्तराखण्ड की सांस्कृतिक परम्परा Harela Festivel 2021 Harela Photo हरेला पर्व उत्तराखंड के कुमाऊँ क्षेत्र का सुप्रसिद्ध और लोकप्रिय त्योहार है। हरेला पर्व से 10 दिन पहले घरों में थाली, मिट्टी व रिंगाल से बनी टोकरी में 7 प्रकार का अनाज बोया जाता है, जिसमें प्रत्येक दिन जल चढ़ाकर इसकी पूजा-अर्चना की जाती है भगवान से परिवार में सुख, समृद्धि और शांति बनाए रखने की प्रार्थना की जाती है। मान्यता है कि जिसका हरेला जितना बड़ा होगा उसे कृषि में उतना ही लाभ होगा इसलिए इस दौरान किसान अपनी फसल की पैदावार का अनुमान भी लगाते हैं।

इस दिन घर के बड़े-बुजुर्ग परिवार के सदस्यों के सिर पर हरेला के तिनके रखते हुए हुए उन्हें आशीर्वाद भी देते हैं। इसलिए इस त्योहार को खुशहाली और उन्नति का प्रतीक भी माना गया है। हरेला पर्व परे घरो की छत पर काले कवै को पूवे पकवान भी खिलाये जाते है

मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने प्रदेशवासियों को हरेला पर्व की शुभकामनाएं दी है। उन्होंने कहा कि पर्यावरण को समर्पित ‘‘हरेला‘‘ पर्व उत्तराखण्ड की सांस्कृतिक परम्परा का प्रतीक है। यह त्योहार सम्पन्नता, हरियाली और पर्यावरण संरक्षण का सन्देश देता है।मुख्यमंत्री ने कहा कि जुलाई एवं अगस्त माह का समय वृक्षारोपण के लिए सबसे उपयुक्त है। हमें अपनी परम्पराओं एवं परिवेश को बढ़ावा देना होगा। प्रकृति को महत्व देने की हमारी परम्परा रही है।

मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने कहा कि हरेला सुख-समृद्धि व जागरूकता का भी प्रतीक है। पर्यावरण बचाने की संस्कृति की ऐसी सुंदर झलक देवभूमि उत्तराखंड में ही दिखती है। आने वाली पीढ़ी को शुद्ध हवा व वातावरण मिल सके इसके लिए सबको वृक्षारोपण व पर्यावरण संरक्षण की ओर ध्यान देना होगा। ग्लोबल वर्मिंग की समस्या से आज दुनिया भर के देश चिंतित हैं। यह पर्व ग्लोबल वार्मिंग के खिलाफ लड़ने का संदेश भी देता है।


Share

Leave a Comment

error: Content is protected !!